Monday, August 30, 2010

दांव पर अनाज

शायद इसी को कहते हैं कुदरत का तकाजा... हमेशा से ही कुदरत पर कहर ढहाने वाली दुनिया के अधिकतर देश आज कुदरत का सबसे प्रलयकारी तांडव देख रहे हैं... अर्से बाद विश्व के कई हिस्सों में मौसम कि ऐसी नाराज़गी एक साथ देखने को मिली है...

दुनिया अभी वित्तीय संकटों से जूझ ही रही थी कि अनाज बाज़ार पर छाया संकट मुंह बाए खड़ा हो गया... दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा गेंहू उत्पादक और निर्यातक देश रूस, आज, भयानक सूखे का सामना कर रहा है... यहाँ का तापमान पिछले 130 साल के सबसे ऊँचे स्तर पर पहुँच गया है और देश के कई जंगल आग का समंदर बन चुके हैं... वहीँ विश्व का छठा सबसे बड़ा गेंहू उत्पादक और रूस का पड़ोसी मुल्क बड़ी इससे अछूता नहीं है...

भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान में करीब दस लाख एकड़ कि कृषि भूमि उसके 63 साल पुराने इतिहास की सबसे बड़ी बाढ़ की भेंट चढ़ गई है। अफगानिस्तान और आस्ट्रेलिया में फसल का एक बड़ा हिस्सा टिड्डी चट कर गई है। वहीं भारत में भी पिछले एक दशक में मौसम के रंग बदले हैं और इस साल हो रही असंतुलित वर्षा ने तो स्थिति को और बिगाड़ दिया है... मक्के और जो की फसल का हाल भी गेंहू से अलग नहीं है और दुनियाभर में मक्के का भंडार 13 साल के सबसे निचले स्तर पर बताया जा रहा है...
इस तरह अनाज के लगातार घटते उत्पादन को देखते हुए कई देशों ने इसके निर्यात पर पाबन्दी लगाने का फैसला कर लिया है... इस साल चार करोड़ टन गेंहूँ निर्यात का लक्ष्य तय करने वाले रूस ने भी स्थिति की भयावहता को देखते हुए, इसके निर्यात पर चार महीने की पाबंदी लगा दी है...

अमेरिका के कृषि विभाग ने पूरी दुनिया में गेंहूँ का उत्पादन करीब ढाई फीसदी तक घटने का आंकलन किया है... जिसकी वज़ह से गेंहूँ की कीमतें पचास फीसदी तक बढ़ने का अनुमान है... इसके साथ ही सभी विकसित और विकासशील देशों ने अपने अनाज भण्डार भरने शुरू कर दिए हैं जो इन बढती कीमतों को और हवा दे सकते हैं...

इधर मंहगाई की आग में झुलस रहे भारत के लिए तो यह स्थिति घी का काम कर बाज़ार में बदहवासी बढ़ा सकती है... ऊपर से बुरी तरह चरमरा रही खाद्य अर्थव्यवस्था के कारण अनाज बिक या बंट नहीं बल्कि सड़ रहा है... जिस कारण भारत को अपनी एक अरब से ज्यादा की आबादी का पेट भरने के लिए, दूसरे देशों पर निर्भर करना पड़ रहा है... जो कि देश के आर्थिक बजट के लिए अच्छा संकेत नहीं है

बढती आबादी कि मांगों को देखते हुए अनाज कि उपज दोगुनी करने के कयास तो पहले ही लगाए जा रहे थे। किन मौसम का बिगड़ा मिजाज़ यह स्थिति इतनी जल्दी सामने ला खड़ी करेगा, ये शायद ही किसी ने सोचा था। अब जब लगातार हालत बद से बदतर होते जा रहे हैं तो विश्व के सभी देश अपने हाथ-पांव मारने लगे हैंऔर अचानक ही वित्तीय बाज़ारों से हटकर सबका ध्यान खेतों कि ओर चला गया है क्योंकि इस बार खेत किसी चिड़िया ने नहीं बल्कि मौसम ने चुगे हैं। अब अगर ज्यादा देर हुई तो पछतावे और दूसरों के आगे हाथ फैलाने के अलावा हमारे पास कुछ भी नहीं रह जाएगा। कुछ भी नहीं॥

1 comment:

  1. likhne me ummido ko badhane wale tathyo hamesha hi achchhe hote hain.
    achchha likha hai aapne . sawalo par aur sochiye.......

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