मेरे दिल की गहराइयों से निकली एक टीस , जिसे मैंने पढ़ा है किसी की नीरस आँखों में, महसूस किया है उसकी दर्द भरी आवाज़ में...
मैं आज एक ऐसी हकीकत को बोलों में पिरोने जा रही हूँ
जिसे आज कि हमारी "so called well-cultured n well-mannered" पीढ़ी वास्तविकता के धरातल पर लाने में अपनी कोई कसर नहीं छोडती....

यहाँ जो छोटी सी कविता मैं लिख रही हूँ उसका शीर्षक सोचना शायद मेरे बस में नहीं है....
कविता कुछ इस प्रकार है :-
जिन हाथों ने कभी मांगी थी हमारे लिए मन्नतें
क्यों आज जुड़े हैं वही हमसे मांगने के लिए मिन्नतें ???
जिन कंधों ने पढाया था हमें जीवन का हर पाठ
क्यों आज नहीं है कोई उन्ही के साथ ???
वो तोतली ज़बान जो ज़िन्दगी भर की ख़ुशी दे जाती थी
क्यूँ आज वही चिल्लाहट बनकर मौत का फरमान सुना जाती है ???
फिर भी न कोई शिकवा हैं न शिकायतें
शायद कुछ ऐसी ही होती हैं माता पिता की मोहबत्तें ....
जिन्हें हम बच्चे कभी समझ नहीं पाते
और न ही कभी समझने की कोशिश करते हैं
पर 'वो' हमें भी एक दिन शायद
यह अच्छी तरह एहसास करवाएगा कि
जिन्दा रहकर भी मर जाते हैं वो
जिनके अपने ही नहीं समझ पाते हैं उनकी मोहबत्तें.....
उम्मीद करती हूँ की मेरी यह छोटी सी कविता आपके दिल में भी एक गूँज बन कर उभरेगी और मेरी यह छोटी सी पहल एक मिशन के रूप में उन सभी बुजुर्गों को इन्साफ दिलाएगी जिनका आशीर्वाद ऊपर वाले के वरदान से कम नहीं है ....
इन सब के आशीर्वाद से ही मैं अपने ब्लॉग का श्री गणेश कर रही हूँ.... आशा है गूँज : एक मिशन को आप कामयाब बनायेंगे...
गुंजन जैन
नए ब्लॉग के लिए बहुत बहुत बधाई ..आशा है कि यह "गूँज" बहुत दूर तक सुनाई देगी.
ReplyDeleteAccha hai vaise mujhe kavitaon me zyada ruchi nehi hai. I'm vry poor in it, phir bhi gud1. keep it up
ReplyDeleteboooring
ReplyDeleteachchha laga !!!
ReplyDeletemaa babuji k prati shradha jagane ka behatarin prayas.....halaki mere pas unke liye sabd hi nahi hai
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