Sunday, September 19, 2010

"WITH ME ALWAYS"


This poem is basically a sequel of my previous poem ' Alone I Stand'.....

"WITH ME Always"

Alone I was

Alone I am

Alone I will be

But you are

With me Always…


Whole world ignore me

Everyone leave me

Destiny also cheats me

But you are

With me Always…


My sky and earth

Has no end

And here I stand

All alone between them

And you are always

There with the flame


You guide and support me

Whenever I fumble

You motivate and inspire me

Whenever I crumble


My life has no meaning

Without you but

It has got everything with you

My “DREAMS”


Monday, August 30, 2010

" Alone I Stand "












Whole world is around me,
Everyone is with me,
But still my sky and earth
Never seek an end
I don’t know, why
Alone I stand!!


Although I have everything,
I don’t have anything,
This plane of my thoughts
Never gone to land,
I don’t know, why
Alone I stand!!


My presence also has an absence,
May be this makes no sense
But the only thing I want
Is to know, why
Alone I stand!!


Time is slipping of my hands,
Just like the yellow sand
But still I am unable
To understand, why
Alone I stand!!

दांव पर अनाज

शायद इसी को कहते हैं कुदरत का तकाजा... हमेशा से ही कुदरत पर कहर ढहाने वाली दुनिया के अधिकतर देश आज कुदरत का सबसे प्रलयकारी तांडव देख रहे हैं... अर्से बाद विश्व के कई हिस्सों में मौसम कि ऐसी नाराज़गी एक साथ देखने को मिली है...

दुनिया अभी वित्तीय संकटों से जूझ ही रही थी कि अनाज बाज़ार पर छाया संकट मुंह बाए खड़ा हो गया... दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा गेंहू उत्पादक और निर्यातक देश रूस, आज, भयानक सूखे का सामना कर रहा है... यहाँ का तापमान पिछले 130 साल के सबसे ऊँचे स्तर पर पहुँच गया है और देश के कई जंगल आग का समंदर बन चुके हैं... वहीँ विश्व का छठा सबसे बड़ा गेंहू उत्पादक और रूस का पड़ोसी मुल्क बड़ी इससे अछूता नहीं है...

भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान में करीब दस लाख एकड़ कि कृषि भूमि उसके 63 साल पुराने इतिहास की सबसे बड़ी बाढ़ की भेंट चढ़ गई है। अफगानिस्तान और आस्ट्रेलिया में फसल का एक बड़ा हिस्सा टिड्डी चट कर गई है। वहीं भारत में भी पिछले एक दशक में मौसम के रंग बदले हैं और इस साल हो रही असंतुलित वर्षा ने तो स्थिति को और बिगाड़ दिया है... मक्के और जो की फसल का हाल भी गेंहू से अलग नहीं है और दुनियाभर में मक्के का भंडार 13 साल के सबसे निचले स्तर पर बताया जा रहा है...
इस तरह अनाज के लगातार घटते उत्पादन को देखते हुए कई देशों ने इसके निर्यात पर पाबन्दी लगाने का फैसला कर लिया है... इस साल चार करोड़ टन गेंहूँ निर्यात का लक्ष्य तय करने वाले रूस ने भी स्थिति की भयावहता को देखते हुए, इसके निर्यात पर चार महीने की पाबंदी लगा दी है...

अमेरिका के कृषि विभाग ने पूरी दुनिया में गेंहूँ का उत्पादन करीब ढाई फीसदी तक घटने का आंकलन किया है... जिसकी वज़ह से गेंहूँ की कीमतें पचास फीसदी तक बढ़ने का अनुमान है... इसके साथ ही सभी विकसित और विकासशील देशों ने अपने अनाज भण्डार भरने शुरू कर दिए हैं जो इन बढती कीमतों को और हवा दे सकते हैं...

इधर मंहगाई की आग में झुलस रहे भारत के लिए तो यह स्थिति घी का काम कर बाज़ार में बदहवासी बढ़ा सकती है... ऊपर से बुरी तरह चरमरा रही खाद्य अर्थव्यवस्था के कारण अनाज बिक या बंट नहीं बल्कि सड़ रहा है... जिस कारण भारत को अपनी एक अरब से ज्यादा की आबादी का पेट भरने के लिए, दूसरे देशों पर निर्भर करना पड़ रहा है... जो कि देश के आर्थिक बजट के लिए अच्छा संकेत नहीं है

बढती आबादी कि मांगों को देखते हुए अनाज कि उपज दोगुनी करने के कयास तो पहले ही लगाए जा रहे थे। किन मौसम का बिगड़ा मिजाज़ यह स्थिति इतनी जल्दी सामने ला खड़ी करेगा, ये शायद ही किसी ने सोचा था। अब जब लगातार हालत बद से बदतर होते जा रहे हैं तो विश्व के सभी देश अपने हाथ-पांव मारने लगे हैंऔर अचानक ही वित्तीय बाज़ारों से हटकर सबका ध्यान खेतों कि ओर चला गया है क्योंकि इस बार खेत किसी चिड़िया ने नहीं बल्कि मौसम ने चुगे हैं। अब अगर ज्यादा देर हुई तो पछतावे और दूसरों के आगे हाथ फैलाने के अलावा हमारे पास कुछ भी नहीं रह जाएगा। कुछ भी नहीं॥

Wednesday, August 18, 2010

एक कडवा सच

मेरे ब्लॉग का पहला लेख, लेख नहीं बल्कि कविता और अगर देखा जाए तो उससे भी बढ़कर....
मेरे दिल की गहराइयों से निकली एक टीस , जिसे मैंने पढ़ा है किसी की नीरस आँखों में, महसूस किया है उसकी दर्द भरी आवाज़ में...
मैं आज एक ऐसी हकीकत को बोलों में पिरोने जा रही हूँ
जिसे आज कि हमारी "so called well-cultured n well-mannered" पीढ़ी वास्तविकता के धरातल पर लाने में अपनी कोई कसर नहीं छोडती....



यहाँ जो छोटी सी कविता मैं लिख रही हूँ उसका शीर्षक सोचना शायद मेरे बस में नहीं है....
कविता कुछ इस प्रकार है :-
जिन हाथों ने कभी मांगी थी हमारे लिए मन्नतें
क्यों आज जुड़े हैं वही हमसे मांगने के लिए मिन्नतें ???
जिन कंधों ने पढाया था हमें जीवन का हर पाठ
क्यों आज नहीं है कोई उन्ही के साथ ???
वो तोतली ज़बान जो ज़िन्दगी भर की ख़ुशी दे जाती थी
क्यूँ आज वही चिल्लाहट बनकर मौत का फरमान सुना जाती है ???
फिर भी न कोई शिकवा हैं न शिकायतें
शायद कुछ ऐसी ही होती हैं माता पिता की मोहबत्तें ....
जिन्हें हम बच्चे कभी समझ नहीं पाते
और न ही कभी समझने की कोशिश करते हैं
पर 'वो' हमें भी एक दिन शायद
यह अच्छी तरह एहसास करवाएगा कि
जिन्दा रहकर भी मर जाते हैं वो
जिनके अपने ही नहीं समझ पाते हैं उनकी मोहबत्तें.....

उम्मीद करती हूँ की मेरी यह छोटी सी कविता आपके दिल में भी एक गूँज बन कर उभरेगी और मेरी यह छोटी सी पहल एक मिशन के रूप में उन सभी बुजुर्गों को इन्साफ दिलाएगी जिनका आशीर्वाद ऊपर वाले के वरदान से कम नहीं है ....

इन सब के आशीर्वाद से ही मैं अपने ब्लॉग का श्री गणेश कर रही हूँ.... आशा है गूँज : एक मिशन को आप कामयाब बनायेंगे...

गुंजन जैन